द्वारावती - 87

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87चंद्र ने अपनी स्थिति बदल ली । वह व्योम में कुछ अंतर आगे बढ़ गया । अब उसकी ज्योत्सना उत्सव तथा केशव को प्रकाशित कर रही थी जिनसे उनके मुख देदीप्यमान हो रहे थे। समग्र तट पर चंद्रिका व्याप्त थी। तट की रेत पर वह स्थिर थी। जैसे नितांत श्वेत चादर। वही चंद्रिका समुद्र की लहरों के साथ गतिमान थी, चंचल थी, उन्मुक्त थी। चाँदनी के दोनों भिन्न भिन्न रूप देखकर गुल के मन में कुछ मनसा जागी। वह शिला से उठी। चाँदनी से धवल हुए तट की रेत पर चलने लगी। उत्सव-केशव भी उसके साथ चलने लगे। बिना किसी प्रश्न