क्वार्टर नम्बर तेइस माँ और तीनों बहनों की हँसी अशोक ने बाहर से ही सुन ली| हमेशा की तरह इस बार भी हँसी उसे अचरज तथा रोष से भर गयी| रेल गाड़ियों के धुएं और धमाके के हर दूसरे पल पर डोल रहे इस क्वार्टर नंबर तेइस में रह कर भी भला कोई हँस सकता था? पैसे के बढ़ रहे दख़ल के कारण हर दूसरे कदम पर पैसे की तंगी से लाचार रहने के बावजूद कैसे हँस लेती थीं बहनें और माँ? रेलवे पार्सल बुक कराने के लिए जिस खिड़की पर लोग अशोक से पर्ची बनवाने आते वहां उसे बीस