पुर्जा-पुर्जा मन ------------------ ये कोई नयी बात नहीं है ,न उसके और न किसी और के लिए । मन तो मन ही होता है चाहे वह किसी का भी क्यों न हो। वह प्रफुल्लित होता है,दुखी होता है,टूटता है,जुड़ता है।अंधेरों में -उजालों में सरगोशियाँ करता है । कभी गुब्बारे सा फुलाया जाता है तो कभी भीगे तौलिये सा निचोड़ा जाता है । कभी उस पर पीली हल्दी सा रंग चढ़ जाता है तो अगले ही पल वह सिंदूरी हो उठता है ।देखा है क्या किसी ने मन को ? सब करते हैं मन की बात पर मन आखिर है क्या?