पारगमन

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पारगमन यदि सभी ग्रह घूमा करते हैं और हमें घुमाया करते हैं तो मैं जरूर इन से बाहर हो लिया हूँ| स्थिर एवं स्थावर! जब तक धरती का वासी रहा हमेशा गति पकड़े रहा| जागते में तो घूमता ही, सोते में भी घूमा करता| माता-पिता, मित्र-शत्रु, पत्नी-सास, बेटे-बेटी, डॉक्टर-नर्स सभी ने घुमाए रखा मुझे..... एक सर्वगुण भैया को छोड़कर..... लेकिन अब कहीं नहीं जाना मुझे..... न आगे..... न पीछे..... न अस्पताल, न अपने उस ढलाईघर में, जहाँ कच्चे लोहे से स्टील तैयार किया जाता था| जिसे उसके पुराने ‘उत्तम ढलाई-घर’ वाले नाम से मेरी पत्नी ने ‘मॉडर्न फाउन्ड्री का नाम