रम्भा

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रम्भा सोने से पहले मैं रम्भा का मोबाइल ज़रूर मिलाता हूँ| दस और ग्यारह के बीच| ‘सब्सक्राइबर नाट अवेलेबल’ सुनने के वास्ते| लेकिन उस दिन वह उपलब्ध रही- “इस वक़्त कैसे फ़ोन किया, सर?” “रेणु ने अभी फ़ोन पर बताया, कविता की शादी तय हो गयी है,” अपनी ख़ुशी को तत्काल काबू कर लेने में मुझे पल दो पल लग गए| रेणु मेरी बहन है और कविता उसकी बेटी| रम्भा को मेरे पास रेणु ही लाई थी- “भाई, यह तुम्हारा सारा काम देखेगी| फ़ोन, ई-मेल और डाक.....!” “हरीश पाठक से?” रम्भा हँसने लगी| “तुम्हें कैसे मालूम?” “उनके दफ़्तर में सभी