नगाड़ा

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नगाड़ा मई की चिलचिलाती दुपहरी अंगारे बरसा रही थी, उस पर बवंडर उठाती गर्म हवा । जमीन झुलसी जा रही थी । पानी सूख रहा था । खेत दरारों से पटे जा रहे थे । और शहरों में थोड़ी – थोड़ी छाया का टुकड़ा पाकर पशु – पक्षी दुबके पड़े थे । गली – चौराहों के नीम – पीपल की छाया में रिक्शे वाले गमछे से मुँह लपेटे अपने – अपने रिक्शों के हुड उठाए सोए थे । कोई कहीं चलने को कहता तो सीधे ‘ना’ में सर हिला देते । दुकानों – गलियों के साथ आकाश भी सूना था