अलभ्य जिस वक्त मैं ट्रेन से उतरकर प्लेटफाॅर्म पर आया, सुबह के चार बजकर सत्रह मिनट हो रहे थे। घड़ी मेरी कलाई पर बंधीं थी, लेकिन समय का भान प्लेटफाॅर्म पर उतरते ही रेलवे स्टेशन की उस इलेक्ट्राॅनिक घड़ी से हुआ, जिसके डायल पर लाल रंग के चमकते अंकों पर अनायास आंखें जा टिकी थीं। ऐन इसी वक्त मैंने अपनी घड़ी भी देखी और इत्मीनान हुआ कि मेरी घड़ी भी ‘राइट टाइम’ चल रही है। मेरे पास एक छोटी-सी सफारी अटैची थी और मैं इस ट्रेन से उतरा इकलौता मुसाफिर था। प्लेटफाॅर्म पर दूर-दूर तक सन्नाटा था और जो लोग