कुरुक्षेत्र

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कुरुक्षेत्र तूलिका की वजह से आज एक और प्रैस्टीजियस एसाइनमेंट मेरे हाथ लगा था और इस समय ओरिएन्टल एक्सपोर्ट हाउस से निकलकर अपने वायदे के अनुसार मुझे आज का बाकी समय उसी के साथ गुजारना था, उसकी मर्जी के मुताबिक। ” अब कहाँ चलेंगे?” “अरे पहले बैठो तो!” कहते हुए तूलिका ने पार्किंग में खड़ी अपनी फिएट में मुझे लगभग ढकेलते हुए अंदर किया और दरवाजा बंद करने के बाद घूमकर अपनी ड्राइविंग सीट संभाल ली। सड़क के दोनों ओर लगे पेड़ों की झुरमुट से गुजरते हुए कार तेजी से आगे दौड़ने लगी और