रण-नाद प्रधानाध्यापिका की अपनी पहली नियुक्ति के अन्तर्गत जब मुझे दूर का कस्बापुर मिला तो मैं घबरा गयी। अभी तक के अपने छत्तीस वर्ष मैंने अपने मार्गदर्शक, वकील पिता और स्नेही, एहतियाती माँ की शरण में बिताये थे। बचपन में छत से गिर जाने के कारण पैर में लगी एक चोट ने मुझे पंगु कर दिया था और अपने पाँच बहन-भाइयों में मैं अकेली ही अविवाहित रह जाने से उन्हीं के साथ बनी रही थी जब कि दूसरे वे सभी अपने अपने परिवारों के संग अलग रचे-बसे थे। “लखनऊ से तुम्हारे साथ हमारी ‘तेजबुद्धि’ चली जाएगी और तुम्हें पता भी