खिलखिलाते बचपन से बड्डपन कब आया
पता ही नही चला....
अंदर के जस्बात लफ्ज़ बनके बाहर कब आये
पता ही नही चला....
सपनो की सरीता समन्दर कब बन गए
पता ही नही चला.....
सोये हुवे अरमा आंधी बनके कब उडचले
पता ही नही चला....
जिंदगी जीने की आग मौत की राख कब बनी गए
पता ही नही चला.....