दर्द तो रहता ही है,बस अब एहसास नहीं होता
बिखर चुका इस कदर की में अपने पास नहीं होता
जलती लौ ही दिए कि आखिरी नुमाइश हो गई
अब कोई चिलमन ना रही ना ही कोई धुवां होगा
जिस हाकिम से मांगी थी मोहलत दो सांस की
दर्द का हिसाब ना ही जुल्म का इंतेहा हुआ
कलम शायर की गुफ्तगू करती थी हमसे रोज़ाना
अब इसमें कोई काफिया ना कोई लफ्ज़ न रहा
करते होंगे खुद को बर्बाद कई, लाज़िम है
हम में अब वो हुनर ओर वो काफिर ना रहा