*सवेरा क्यों होता है?*
यूँ ही रहने दो स्त्रीत्व को मेरे,
न इसे जगाने की कोशिश करो।
समाज की बंधी इन बेड़ियों से,
आजाद न हो पाया स्त्रीत्व।
क्षण भर के इस संसार में,
हर वक्त परखा गया मुझे।
नहीं दिये पंख मेरे जीवन को,
फिर भी सवाल उठाये मेरे स्त्रीत्व पर।
बहते आंसू कभी थम नहीं पाये,
फिर भी रोज जगाने सवेरा आता है।