*ये जिंदगी*
तू क्यों सताती है मुझे इतना
कि न रोने की जगह है, न हँसने का ठिकाना
अँधेरी रातों से सुबह के उजालों तक,
बस 'सुकून' के नाम पर, खुद को ही खोना।
मैं भटकती रही तेरी तलाश में
कभी बेबस होकर, कभी उम्मीद के पास में
अपनों की महफिल में भी तन्हा ही रही,
एक उम्र गुज़ार दी मैंने इसी प्यास में।
तू औरों की खातिर हसीन बहुत है
फिर मुझसे ही क्यों ये बेरुखी है?
मुझसे मुँह मोड़कर बस इतना बता दे,
क्या मेरी वफ़ा, तेरी नज़रों में इतनी बुरी है?
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