आजकल इंसान बदल नहीं रहा
बस अपनी कमज़ोरियों को words में strong कहलाना सीख गया है।
सबको अपने फैसले सही लगते हैं, पर ज़रा भी सवाल करो तो ego hurt हो जाती है।
लोग सुनने से ज़्यादा जवाब देने की जल्दी में रहते हैं, जैसे हर बात में जीतना ज़रूरी हो।
अब conversations नहीं होते, बस comparison होता है।
Respect अब behaviour से नहीं, benefit से मिलती है।
लोग character नहीं देखते, convenience देखते हैं।
हर कोई 'real' बोलता है, पर honesty उन्हें तभी अच्छी लगती है
जब बात किसी और के बारे में हो।
खुद पर आए तो हर इंसान logic ढूँढने लगता है।
Loyalty भी अब choice नहीं, situation बन चुकी है।
लोग depth की बात करते हैं, पर गहरी बात समझने का patience किसी के पास नहीं।
हर कोई अच्छा दिखना चाहता है, पर अच्छा होना किसी की priority नहीं रही।
शायद इसी लिए आजकल silence ही सबसे सच बोलता हुआ लगता है।