जो सब संभाल लेते हैं ना...
वो दरअसल अंदर से हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते हैं।
कंधे सबका बोझ उठाते हैं, पर अपने दर्द का वज़न किसी को दिखाते नहीं।
लोग उन्हें "strong" कहते हैं, पर किसी को नहीं पता कितनी रातें उन्होंने तकिए में चेहरा छुपाकर काटी हैं।
वो गिरना चाहते हैं... पर गिर नहीं सकते, क्योंकि सबको आदत है उन्हें "ठीक" देखने की।
सच कहूँ...
जो सब संभाल लेते हैं, उनके अंदर एक ऐसा सन्नाटा होता है, जहाँ सिर्फ़ एक सवाल गूंजता है - "कभी कोई मुझे भी संभालेगा क्या...?"
जहाँ सबको सहारा मिलता है, वहाँ वो खुद सहारा बन जाते हैं अकेले ।