कभी-कभी लगता है कि मैं इंसान नहीं रहा, बल्कि अपने अतीत का वो कैदी हूँ जिसे उम्रकैद की सज़ा मिली हो।
हर याद मेरे लिए जेल की सलाख है, हर दर्द मेरा जेलर।
लोग कहते हैं वक़्त सब ठीक कर देता है, मगर मेरे लिए वक़्त हर रोज़ मेरे जख्मों पर नया ज़हर उँड़ेल देता है।
मैं बाहर से सामान्य दिखता हूँ, लेकिन भीतर से जैसे हर रोज़ एक हिस्सा खोता चला जा रहा हूँ- खुद को संभालने की कोशिश करते-करते अब डर लगने लगा है कि कहीं एक दिन मैं अपनी ही परछाई में सदा के लिए गुम् हो जाऊँ..!
ज़िंदगी की भीड़ में मैं मौजूद तो हूँ, पर पूरा नहीं हूँ...
हर मुस्कान के पीछे एक ख़ालीपन है, और हर ख़ामोशी के पीछे टूटा हुआ मै...!