इतराती लहेराती
वो हररोज मेरे सामने से गुजरती..
अपने आप मे मदहोश
दुनियां से बेखोफ..
आंखों में कई दास्ता..
चेहरे से कोई अपना सा वास्ता..
उसे पाना चाहता था में
फिर सोचा....
आसमा में उड़ने वालो को भला रिश्तो के पिंजरे से क्यों वाकिफ कराई..
उसकि दुनिया बनाते बनाते
कहि में ..
आसमा के सितारे को यूँ ही जमी पे ना गीरा दु...
- BHAVESHSINH