Quotes by Yug in Bitesapp read free

Yug

Yug

@shitm143gmail.com1059


રૂપાળા દેહમાં આતમનું પણ હોવું જરૂરી છે;
મનોહર ફૂલ છે,ફોરમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

કહાવો છો દયાળુ ને દયાની છાંટ પણ ક્યાં છે?
આ ખાલી કૂપમાં ઝમઝમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

ભલે ને ડૂબીએ પણ તાગ સાગરનો તો લઈ લેશું;
અરે ઝંપલાવ દિલ! જોખમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

જરૂરી છે અગર પુષ્પો મહીં હોવું પરિમલનું;
ફરિશ્તાઓ મહીં આદમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

થયું સાબિત ચમકતી વીજ જોઈને ઘટાઓમાં;
અમાસે કો’ક દી પૂનમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

નજરથી જખ્મ કરનારા!નમક પણ છાંટજો થોડું;
અમારા દર્દ પર મરહમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

નિહાળો ના આ ફાટી આંખથી સૌન્દર્યને ‘નાઝિર’!
પરમદર્શન સમે સંયમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

નાઝીર

Read More

वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

कमरे में अंधेरा था
घुप्प अंधेरा था कुएँ का
उसके भीतर भी

सारी दीवारें टटोली अंधेरे में
लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था
पूरा खुला था दरवाज़ा
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था
सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो
आर्त्तभाव से उसे देखा
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बंद कर दिया।

जैसे ही दरवाजा बंद हुआ
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल
“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?” उसने सोचा।

डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं– रीढ़ के भीतर
तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का

पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था
पर उसने बांची टेलीफोन तालिका
और जानना चाहा
अंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा।

फिर, अपनी सब डॉलरें ख़र्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल।

सबसे पहले अपने बच्चे से कहा
“हैलो-हैलो, बेटे
पैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊंघ गए थे कैसे...
सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे!”

अंतिम दो पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
आफिस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से
फिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकती अपनी माँ से।

... अब उसकी हुई गिरफ़्तारी
पेशी हुई ख़ुदा के सामने
कि इसी एक ज़ुबाँ से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा
“सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे!”
यह तो सरासर है धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा!

लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दी
और कहा–
“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा!”

અનામિકા

Read More

मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ!
... और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।

अनामिका

Read More

हर तरफ छाया है कोहरा...आँखें हैं कुछ मजबूर
धुंधली सी बादल की एक चादर है
कुछ नहीं आता नज़र दूर दूर...
बस कुछ थोड़ी सी रोशनी और उसके पर सब कुछ खोया खोया सा...
मगर इस कोहरे के पार भी है कुछ...दिख रहा जाना पहचाना सा.
हाँ...तेरा चेहरा है...
प्यार बरसाता, मुस्कुराता सा, आँखों में लिए हजारों प्यार के झरने
दिल में अरमानों की झंकार सुनाता सा, होठों पर हैं मीठी मुस्कानों के नक्श गहरे.

तेरे सहारे और प्यार की ताकत है..
जो इस कोहरे के पार भी तेरा प्यारा चेहरा साफ़ दिखाए देता है
चल...जिन्दगी के इस त्यौहार को जी भर के जी लें
मनाएं खुशियाँ .....क्योंकि अभी तुझे और मुझे भी सांस आता है.

तुझ संग बीते लमहों की परछायीआं
मेरे उदास क्षणों को रोशनी देतीं हैं
जब मैं होती हूँ और मेरी तनहाईयाँ
तब ये बीते लम्हें जुगनू बन कर टिमटिमाते हैं

इन प्यार के ख्यालों के सामने कुछ भी सूनापन रह नहीं सकता
तेरा प्यारा चेहरा किसी कोहरे के पीछे छुप नहीं सकता.

अंजना भट्ट

Read More

अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

दूर के चांद को ढूंढ़ो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आंगन में समाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला

निंदा फ़ाज़ली

Read More

यहाँ ख़ामोश नज़रों की गवाही कौन पढ़ता है.
मेरी आँखों में तेरी बेग़ुनाही कौन पढ़ता है.

नुमाइश में लगी चीज़ों को मैला कर रहे हैं सब.
लिखी तख्तों पे "छूने की मनाही" कौन पढ़ता है.

जहाँ दिन के उजालों का खुला व्यापार चलता हो.
वहाँ बेचैन रातों की सियाही कौन पढ़ता है.

ये वो महफिल है, जिसमें शोर करने की रवायत है.
दबे लब पर हमारी वाह-वाही कौन पढ़ता है.

वो बाहर देखते हैं, और हमें मुफ़लिस समझते हैं.
खुदी जज़्बों पे अपनी बादशाही कौन पढ़ता है.

जो ख़ुशक़िस्मत हैं, बादल-बिजलियों पर शेर कहते हैं.
लुटे आंगन में मौसम की तबाही, कौन पढ़ता है.

आशुतोष द्धिवेदी

Read More

कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

बाबा नागार्जुन

Read More

હમણાં એક રકમ ઈનબોક્સમાં કહે " આપ ક્યાંથી છો...?"

મેં કહ્યું, "હું પાકિસ્તાન થી છું..."

सीधी नजर हुयी तो सीट पर बिठा गए।
टेढी हुयी तो कान पकड कर उठा गये। 

सुन कर रिजल्ट गिर पडे दौरा पडा दिल का।
डाक्टर इलेक्शन का रियेक्शन बता गये । 

अन्दर से हंस रहे है विरोधी की मौत पर।
ऊपर से ग्लीसरीन के आंसू बहा गये । 

भूंखो के पेट देखकर नेताजी रो पडे ।
पार्टी में बीस खस्ता कचौडी उडा गये । 

जब देखा अपने दल में कोई दम नही रहा ।
मारी छलांग खाई से “आई“ में आ गये । 

करते रहो आलोचना देते रहो गाली
मंत्री की कुर्सी मिल गई गंगा नहा गए । 

काका ने पूछा 'साहब ये लेडी कौन है'
थी प्रेमिका मगर उसे सिस्टर बता गए।।

काका हाथरसी

Read More

हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी वहीं है,
एक तू ही नहीं है

नज़रें भी वही और नज़ारे भी वही हैं
ख़ामोश फ़ज़ाओं के इशारे भी वही हैं
कहने को तो सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है

हर अश्क में खोई हुई ख़ुशियों की झलक है
हर साँस में बीती हुई घड़ियों की कसक है
तू चाहे कहीं भी हो, तेरा दर्द यहीं है

हसरत नहीं, अरमान नहीं, आस नहीं है
यादों के सिवा कुछ भी मेरे पास नहीं है
यादें भी रहें या न रहें किसको यक़ीं है

साहिल लुधियानवी

Read More