Quotes by Junaid Chaudhary in Bitesapp read free

Junaid Chaudhary

Junaid Chaudhary Matrubharti Verified

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मातृभर्ती कोई भी मेसेज ओपन नही होने दे रहा है। अजीब ज़बरदस्ती है कि 30₹ खर्च करो तभी मेसेज देख पाओगे।। इस से बेहतर तो प्रतिलिपी है जो हम लेखकों को 100 रुपये महीना दे रहा है।और लाखों पाठक भी फ्री। मैं अपनी सभी कहानियां मातृभर्ती से हटा रहा हूँ।। मतलब हम अपनी कहानियां भी फ्री में दे। अपना वक़्त हुनर सब कुछ फ्री दें। और उसके बाद 30 रुपये महीना और 360 रुपये साल के भी दें। हमसे बड़ा बेवकूफ कोन होगा।।

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क़ुबूल कर मेरे चेहरे की झुर्रियां जिन में

कहीं धर्म, कहीं तहज़ीब के तमाचे हैं

ये लोग ख़ुदा है' मुझ पर मुसल्लत हर वक़्त?
क्यों ये मुझको अपने अंदाज से जांचे हैं?


हम पर रखा जाता है मैयार नेकी व बदी का

यानी हम बुरे हैं? बुराई के सांचे हैं??


قبول کر مرے چہرے کی جھُریاں جن میں
کہیں دھرم، کہیں تہذیب کے طمانچے ہیں

یہ لوگ خدا ہیں، مجھ پر مسلط ہر وقت؟
کیوں یہ مجھ کو اپنے انداز سے جانچے ہیں؟؟

ہم پر رکھا جاتا ہے معیار، نیکی و بدی کا
یعنی ہم برے ہیں برائی کے سانچے ہیں؟؟

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जुनैद चौधरी

जुनैद चौधरी

तुम्हे जाना है न?
....!! जाओ!
तुम्हे इस से नही मतलब
गलतफहमी थी या उल्फत
ये मेरा दर्द ए सिर है
दर्द ए दिल है
जो भी है
!___ जाओ
तुम्हारा काम था,तुमने मोहब्बत
की
बहुत अच्छे
ये मेरा काम है में
याद रखूं
.....या भुला डालू
अजब बातें हैं दुनिया की
अजब रस्में है उल्फत की
मोहब्बत कर तो लेते हैं
निभाना भूल जाते हैं
किसी दिन छोड़ जायँगे
बताना भूल जाते हैं
मुझे अब कुछ नही सुनना
मुझे अब कुछ न बतलाओ
मुझे तुम मशवरा मत
....दो
के मैने कैसे जीना है
अगर तुम भूलने का गुण
मुझे बतला नही सकते
तो कुछ भी न बतलाओ
..... चले जाओ
,,,,चले जाओ
.......चले जाओ

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दश्त में दौड़ती आहों की तरह होता है

इश्क़ आगाज़ में खुशबू की तरह होता है

जिस पे चलता है उसे मार के रख देता है

हुस्न का वार भी जादू की तरह होता है

दिन के औ क़ात में नेमत है तेरा ध्यान मुझे

रात पड़ती है तो जुगनू की तरह होता है

इन निगाहों में कभी डूब के देखा जाए

जिन का हर तीर तराज़ू की तरह होता है

अश्क़ पीते हुए याद आया तेरा लम्स मुझे

उसका भी ज़ायक़ा आंसू की तरह होता है।

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दिसंबर चल पड़ा घर से सुना है पहुँचने को है,
मगर इस बार कुछ यूं है के मैं मिलना नही चाहता
सितमगर से, मेरा मतलब दिसंबर से,
कभी अज़ूरदा करता था जाता दिसंबर भी ,
मगर अब के बरस हमदम बहुत ही ख़ौफ़ आता है,
मुझे आते दिसंबर से दिसंबर जो कभी मुझको,
बहुत मेहबूब लगता था वही शफ़ाक़ लगता है,
बहुत बेबाक़ लगता है,हां इस संग दिल महीने से
मुझे अबके नही मिलना,क़सम उसकी नही मिलना,
मगर सुनता हूँ ये भी में के इस ज़ालिम महीने को
कोई भी रोक न पाया न आने से,न जाने से
सदायें ये नही सुनता,वफ़ाएँ ये नही करता,
ये करता है फ़क़्त इतना सज़ाए सौंप जाता है,


शफ़ाक़-सूरज डूबने के बाद कि लाल रोशनी
अज़ूरदा-पीड़ित,नाराज़,ग़मगीन,सताया हुआ

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मेरी धारावाहिक रचना उधड़े ज़ख्म पूरी हो चुकी है। जैसा कि आप लोगो ने हर पार्ट पर हौसला अफ़ज़ाई की है। एक बार फिर एक साथ पूरा पार्ट पढें और इश्क़ की गहराइयों का मज़ा लें। और जो अब तक किसी वजह से नही पढ़ पाएं वो भी इस इश्क़ आमेज़ कहानी को पढ़े जो शायरियों और जज़्बातों से सजी हुई है।



हाय, मातृभारती पर इस धारावाहिक 'उधड़े ज़ख़्म' पढ़ें
https://www.matrubharti.com/novels/10228/udhde-zakhm-by-junaid-chaudhary

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कब लफ़्ज़ों से जुड़ सकता है जो

टूट गया सो टूट गया

वो नाज़ुक से कांच का दिल जो

टूट गया सो टूट गया

कब बारिश को बूंदे छन कर

कोई महल बनाया जाता है

ये ख्वाब है बादल आंखों का जो

टूट गया सो टूट गया

एक आह उठी जो रातों में

किस्मत के तारे तोड़ गयी

हाथो में जाल लकीरों का जो

टूट गया सो टूट गया

क्यों गिन गिन कर दिन जीते हो

अनमोल है जीवन राह तेरी

ये जहां घर है एक सांसो का

जो टूट गया सो टूट गया

ये रात अंधेरी क्या चमकेगी

चाँद से अब पर्दा कर के

नैना वो किस्मत का तारा जो

टूट गया सो टूट गया।

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