ये जो समंदर-सा अहसास है,
इन नदियों के पास कहाँ।
ये तो घूमती है,
भटकती है,
गूंजती है,
फिर हवाओं को अपने में समाती है।
मुड़कर देखती भी नहीं,
टहलती जाती है एक ओर।
जो बसावटे हैं, उन्हें छोड़,
जो वनस्पति है, उन्हें छोड़,
आगे की ओर—जैसे कोई भागा जा रहा हो।
ये मिलना चाहती हो किसी जिम्मेदार से,
जैसे इनका कोई अपना बनाता हो।
इन्हें हवा में उड़कर मिलो दूर से,
जैसे कि समंदर तपकर उड़ता है
इन नदियों के लिए,
उन पहाड़ों पर जो बसे हुए हैं।
नदियों के ऊपर,
ये मंडराती हुई
मिलती है समंदर से—
जो खड़ा हो
जैसे सिर्फ इनसे मिलने पर।
समंदर तो खुद एक देवता है,
जिसमें खोज अभी बाकी है,
जिसकी पहुँच अभी बाकी है।
जिसकी लहरों में खुद संसार बसा है,
जिसकी ज़मीनें दुनिया को जोड़ती हैं,
और नदियाँ इसको पूजती हैं।
ये तो खारा है।
नदियाँ घूमती हैं।
नदियाँ मीठी हैं।