जीवन की यह कठिन डगर है,
साँसों में गहरा सागर है।
उम्मीदों के दीप जलाकर,
चलना ही अपना मंज़र है।
दुखों के बादल घने यहाँ छाए,
मन का पंछी क्यों घबराए?
टूटे पंख और तन्हा राहें,
कौन उसे अब गले लगाए?
पत्थर सा यह मौन खड़ा है,
वक्त बड़ा ही सख्त पड़ा है।
काँटों की चादर पर सोकर,
संघर्षों से इंसान लड़ा है।
सूरज की किरणें आईं अब,
मिटा रही हैं सारा ये शब।
धैर्य की डोरी थामे रखना,
फल मीठा ही मिलता है तब।
सूरज की किरणें आईं अब,
मिटा रही हैं सारा ये शब।
धैर्य की डोरी थामे रखना,
फल मीठा ही मिलता है तब।