पैसा आया तो धैर्य ने चुपचाप
अपने जूते दरवाज़े पर छोड़ दिए,
संवेदनाएँ बोलीं— अब यहाँ जगह कम
है,
और सहनशीलता ने सिर झुका कर विदा ले ली।
अहंकार सिंहासन पर बैठा मुस्कराया,
बोला— अब मैं ही घर का मालिक हूँ,
जहाँ पहले इंसान बसता था,
अब सिर्फ़ दामों में तौला हुआ घमंड रहता है।
आर्यमौलिक