मैने ये तस्वीर हर्ष पर्वत पर ली , जहां लोग मन पसंद के घर बनाते है अपने भविष्य के लिए →→→→→→→
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इंसान मंदिरों में घर की दुआएँ मांगता है,
पर ईर्ष्या की दीवारें कभी नहीं तोड़ पाता है।
पत्थरों से घर तो बना लेता है,
मगर दूसरों के आँगन से पत्थर चुराकर,
अपनी नींव को ऊँचा बताता है।
सच में, हद है इच्छाओं की –
जो इंसान को इंसान ही नहीं रहने देती।