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  • अन्तर्निहित - 51

     [51]पुलिस कार्यालय में नदीम के स्थान पर श्रीधर को स्थानांतरित किया गया था। उसने...

  • Raaz - Part 6

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  • चलो दूर कहीं..! - 24

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  • राहें - 7

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  • महिमा: शक्तिशाली तलवार (सीजन 1) चैप्टर 16

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  • माफिया की दीवानगी - सीजन 2 - 15

    **माफिया की दीवानगी - सीजन 2****(ऑथर नोट: हेलो मेरे प्यारे रीडर्स! पार्ट 14 में...

  • नकाब और तन्हाई - 8

    किस्त 8: कैमरे का लेंस और एक नई उलझनशिकागो की सुबह आज कुछ ज्यादा ही शोर भरी थी।...

  • Mafia's Obsessed Love - 22

    दिल पे ज़ख्म खाते है... जान से गुजरते है..  दिल पे ज़ख्म खाते है ..जान से गुजरते ह...

  • अमृत वाणी - संत वाणी - 8

    “प्यार और विनम्रता ही जीवन के सच्चे आभूषण हैं, बाकी सब केवल बाहरी दिखावा है।”यह...

  • कविताओं का संग्रह- भाग 3

                    कविताओं का संग्रह : भाग 3                                       ...

Conversations With Myself By Aarushi Singh Rajput

यह कहानी किसी एक नाम, किसी एक चेहरे या किसी एक ज़िंदगी की नहीं है…यह कहानी उन सभी एहसासों की है, जो हम अक्सर दुनिया से छुपा लेते हैं।यह कहानी मेरी है…और शायद… तुम्हारी भी।कभी-कभी ज...

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कोख से अंत तक By ARTI MEENA

एक माँ आज रो रही है।
उसका दम घुट रहा है, वह धीरे-धीरे मर रही है।
क्या कोई उसकी पीड़ा को समझ पाएगा,
या यह दर्द उसे उसके अंत की ओर ले जाएगा?
मैं उसे देख रही हूँ…
क्योंकि मैं उसी...

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जीवन का विज्ञान By Vedanta Life Agyat Agyani

यह ग्रंथ किसी विश्वास का प्रतिपादन नहीं करता —
यह केवल जीवन को देखने की दृष्टि है।
जो भीतर घटता है, वही बाहर फैलता है;
जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में।

यहाँ विज्ञान और अध्य...

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शब्द उपनिषद — सृष्टि का मौन विज्ञान By Vedanta Life Agyat Agyani

अध्याय १ — शत्रु : जन्म का विज्ञान

शत्रु केवल विरोध नहीं, जन्म का द्वार है।

भीतर के अंधकार से टकराव ही जागृति है।

ऊर्जा-दृष्टि: शत्रु — विस्फोट, जो चेतना को जगाता है।...

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जीवनोपनिषद By Vedanta Life Agyat Agyani

जीवनोपनिषद  (प्रथम पुस्तक)   प्रस्तावना  सदियों से मनुष्य सत्य की खोज में है।कभी उसने वेदों का सहारा लिया,कभी उपनिषदों की गहराई में उतरने की कोशिश की,कभी गीता सुनी, कभी शास्त्र पढ़...

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सबा By Prabodh Kumar Govil

तेरी पगार कितनी है?
- तीन हज़ार!
- महीने के?
- और नहीं तो क्या, रोज़ के तीन हज़ार कौन देगा रे मुझको?
- ऐसा मत बोल, दे भी देगा! उसने कनखियों से लड़की की ओर देखते हुए कहा।
लड़की...

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जीवन कैसे जिएं? By Priyanshu Jha

माया, अपने बीस के दशक के अंत में एक युवा पेशेवर, हमेशा एक जिज्ञासु और आत्मविश्लेषी व्यक्ति रही है। उसने खुद को लगातार जीवन के गहरे अर्थ और अपने अस्तित्व के उद्देश्य पर विचार करते ह...

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दार्शनिक दृष्टि By बिट्टू श्री दार्शनिक

देखा ही है की, हर लड़का कितना भी ज्ञान प्राप्त करके सफलता को प्राप्त नहीं हो पाता। कितनी भी सावधानी बरतने के बाद भी वह सफल नहीं हो पाता। यहां तक की अत्यंत दुष्कर कार्य को अच्छे से...

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श्रीमत् अष्टावक्रगीता का हिन्दी अनुवाद By JUGAL KISHORE SHARMA

** हे प्रभो ! (पुरुषः ) ज्ञानम् कथम् अवाप्नोति । (पुंसः) मुक्तिः कथम् भविष्यति । ( पुंसः) वैराग्यम् च कथम् प्राप्तम् ( भवति ) एतत् मम ब्रूहि ॥१॥

Old king Janak asks the young As...

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दिव्य पुरुष कैसे बने ? By Mohit Rajak

दोस्तों आपने कोई ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है, जो सभी चीजों में माहिर हो जिसे सब काम बहुत अच्छे से करना आता हो। शायद ही ऐसे व्यक्ति के बारे में आप नहीं सुना हो ,यदि मैं आपसे कहू...

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उसका दम घुट रहा है, वह धीरे-धीरे मर रही है।
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या यह दर्द उसे उसके अंत की ओर ले जाएगा?
मैं उसे देख रही हूँ…
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यह ग्रंथ किसी विश्वास का प्रतिपादन नहीं करता —
यह केवल जीवन को देखने की दृष्टि है।
जो भीतर घटता है, वही बाहर फैलता है;
जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में।

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अध्याय १ — शत्रु : जन्म का विज्ञान

शत्रु केवल विरोध नहीं, जन्म का द्वार है।

भीतर के अंधकार से टकराव ही जागृति है।

ऊर्जा-दृष्टि: शत्रु — विस्फोट, जो चेतना को जगाता है।...

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जीवनोपनिषद By Vedanta Life Agyat Agyani

जीवनोपनिषद  (प्रथम पुस्तक)   प्रस्तावना  सदियों से मनुष्य सत्य की खोज में है।कभी उसने वेदों का सहारा लिया,कभी उपनिषदों की गहराई में उतरने की कोशिश की,कभी गीता सुनी, कभी शास्त्र पढ़...

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सबा By Prabodh Kumar Govil

तेरी पगार कितनी है?
- तीन हज़ार!
- महीने के?
- और नहीं तो क्या, रोज़ के तीन हज़ार कौन देगा रे मुझको?
- ऐसा मत बोल, दे भी देगा! उसने कनखियों से लड़की की ओर देखते हुए कहा।
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माया, अपने बीस के दशक के अंत में एक युवा पेशेवर, हमेशा एक जिज्ञासु और आत्मविश्लेषी व्यक्ति रही है। उसने खुद को लगातार जीवन के गहरे अर्थ और अपने अस्तित्व के उद्देश्य पर विचार करते ह...

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श्रीमत् अष्टावक्रगीता का हिन्दी अनुवाद By JUGAL KISHORE SHARMA

** हे प्रभो ! (पुरुषः ) ज्ञानम् कथम् अवाप्नोति । (पुंसः) मुक्तिः कथम् भविष्यति । ( पुंसः) वैराग्यम् च कथम् प्राप्तम् ( भवति ) एतत् मम ब्रूहि ॥१॥

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दिव्य पुरुष कैसे बने ? By Mohit Rajak

दोस्तों आपने कोई ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है, जो सभी चीजों में माहिर हो जिसे सब काम बहुत अच्छे से करना आता हो। शायद ही ऐसे व्यक्ति के बारे में आप नहीं सुना हो ,यदि मैं आपसे कहू...

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