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महाभारत की कहानी - भाग-१८६ भीष्म वर्णित वेण और पृथु राजा की कथा प्रस्तावना कृष...
(सुबह।)(कौशिक आईने के सामने खड़ा है। आँखों पर चश्मा।)कौशिक (थोड़ा असहज होकर) बोल...
भूल-120 डॉ. आंबेडकर के प्रति दुर्व्यवहार स्वतंत्रता-पूर्व के दौर के नेताओं में क...
विक्की :- और नही तो क्या , तुम्हारी औकात ही क्या है , तुमने यो सोचा भी कैसे के त...
घर के सबसे ज्यादा खालीपन अगर कहीं था, तो वह मेरे ताऊजी की आँखों में था। पिताजी क...
"प्लीज़ मुझे जाने दो। मुझे तुमसे शादी नहीं करनी। मेरे भी कुछ सपने हैं!" पंखुड़ी...
शुक्रवार का दिन था , तीनो गार्ड अपनी अपनी जगह पर तैनात थे , हमीद अंसारी धीरे कदम...
अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या और वीर रात भर मोबाइल पर अपने मिलन के सपने बुनते रहे, ल...
"क्या कहा रे तूने???????? अब तू मुझे बताएगी कि मुझे क्या बोलना है और क्या नहीं...
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कभी-कभी ज़िंदगी में कोई ऐसा मोड़ आता है जहाँ सबकुछ पहले जैसा रहते हुए भी अचानक अलग लगने लगता है।कहानी है अनाया की — एक मासूम-सी लड़की, जिसके सपनों में सिर्फ़ एक ही ख्वाब था — डॉक्ट...
प्यार के बारे में कुछ भी लिखने से पहले, अभी यहां पर मे एक छोटी सी कहानी लिख रहा हूँ, क्योंकि इससे होगा यह कि, प्यार वाले रिस्तों के लिए जो समझदारी की गहराई जरूरी होती है, वह आसानी...
सुमित्रा वर्मा दिल्ली की एक प्रतिष्ठित बिज़नेस फैमिली से थी। उसके पिता की चाय पत्ती का व्यापार भारत और नेपाल तक फैला था। जब पिता ने उसे नेपाल के काठमांडू प्लांट की देखरेख की ज़िम्...
मुंबई का सबसे बड़ा और आलीशान घर जिसके बाहर दीवान पैलेस लिखा हुआ था आज उसे बड़ी ही खूबसूरती से सजाया गया था। रात के अंधेरे में ये घर किसी खूबसूरत तारे की तरह चमक रहा था। चारों तरफ...
"नहीं! ऐसा मत करो, छोड़ दो please..... जाने दो! नहीं! नहीं!" "रात्रि उठ! ऐसा कहकर मेघा (रात्रि की मां) ने रात्रि को झकझोर दिया। कितनी बार कहा है इस लड़की को की छोड़...
सुबह के पाँच बजे। आरती आँगन में झाड़ू लगा रही थी। ठंडी हवा के साथ उसकी साँसों में थकान भी मिल गई थी। माँ खाँस रही थीं और छोटा भाई अमित अभी तक बिस्तर में गोल होकर पड़ा था। आरती (...
कभी-कभी ज़िंदगी वो सवाल पूछ लेती है... जिनका जवाब सिर्फ ख़ामोशी के पास होता है। और मोहब्बत... वो अक्सर वहीं से शुरू होती है, जहाँ लोग टूट कर बिखर जाते हैं। सहर की हल्की सी रौ...
सड़कों पर रोज़ की तरह भीड़ दौड़ रही थी। हर कोई कहीं पहुंचने की जल्दी में था। लेकिन उन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा ऐसा भी था, जो न दौड़ रहा था, न रुक रहा था — बस चल रहा था... अ...
वो एक पुरानी, तीन मंज़िला इमारत थी — शहर के शोर से कुछ दूर, जहाँ दीवारों पर समय के निशान उभर आए थे। इमारत की दरारों में पुराने नोट्स की स्याही अब भी महकती थी, जैसे हर दीवार किसी अ...
“आलीज़ा, जल्दी चलो! मगरिब का वक़्त हो गया है।” ज़ायरा की आवाज़ फिर कमरे में गूंजी, लेकिन आलीज़ा को जैसे सुनाई ही नहीं दे रहा था। वो अपने बिस्तर पर अधलेटी, गहरी निगाहों से किताब के...
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