"प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम""सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है?"पर समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है।"नागेंद्र के लिए यह किसी सपने से कम न था। वर्षों बाद सुलोचना का यूँ अचानक सामने आ जाना उसकी कल्पना से परे था। वह दौर याद आया जब इंटरव्यू में मिलती असफलताओं ने उसे तोड़ दिया था और एक सुरक्षित भविष्य की खातिर उसने सुलोचना को बिना बताए छोड़कर अपर्णा से विवाह कर लिया था।
Full Novel
प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम - 1
प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है? समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है। नागेंद्र के लिए यह किसी सपने से कम न था। वर्षों बाद सुलोचना का यूँ अचानक सामने आ जाना उसकी कल्पना से परे था। वह दौर याद आया जब इंटरव्यू में मिलती असफलताओं ने उसे तोड़ दिया था और एक सुरक्षित भविष्य की खातिर उसने सुलोचना को बिना बताए छोड़कर अपर्णा से विवाह कर लिया था। आज दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद सुलोचना का साक्षात् चेहरा देखकर ...Read More
प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम - 2
Part 2"दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में बच्चों के कपड़ों की एक दुकान पर अपने सात साल के बेटे, के लिए ड्रेस चुनते-चुनते अचानक नागेंद्र के हाथ रुक गए।उसने चोरी-छिपे और फिर थोड़ा और गौर से पीछे मुड़कर देखा। सामने वाली दुकान पर एक महिला कपड़े देख रही थी।नागेंद्र को केवल उसकी पीठ दिखाई दे रही थी, फिर भी पीछे से वह उसे कुछ जानी-पहचानी सी लगी।नागेंद्र ने सोचा, शायद दफ्तर की कोई सहकर्मी या किसी दोस्त की पत्नी होगी। उसने अपना ध्यान वहां से हटाया और फिर से भीड़ के बीच कपड़े देखने लगा।""नागेंद्र जितनी भी कोशिश करता, ...Read More