बाबा.

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विट्ठल पाटिल अब उम्र के उस पड़ाव पर आ चुके थे, जहाँ शरीर धीमा हो जाता है पर मन अब भी पुरानी तरह सजग रहता है। गाँव के बाहर बने छोटे से घर में रहते हुए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खेत, मेहनत और परिवार के लिए लगा दी थी। उनका बेटा, शाम, अब शादी के लायक हो चुका था। विट्ठल जी के चेहरे पर एक संतोष था— “चलो, अब मेरी जिम्मेदारी पूरी होने वाली है। बेटे का घर बस जाएगा।”

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बाबा भाग 1

बाबा भाग 1लेखक राज फुलवरेविट्ठल पाटिल अब उम्र के उस पड़ाव पर आ चुके थे, जहाँ शरीर धीमा हो है पर मन अब भी पुरानी तरह सजग रहता है। गाँव के बाहर बने छोटे से घर में रहते हुए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खेत, मेहनत और परिवार के लिए लगा दी थी।उनका बेटा, शाम, अब शादी के लायक हो चुका था। विट्ठल जी के चेहरे पर एक संतोष था—“चलो, अब मेरी जिम्मेदारी पूरी होने वाली है। बेटे का घर बस जाएगा।”शादी की खुशबूगाँव में खूब धूमधाम से शादी हुई। ढोल-ताशे, रंग, रिश्तेदारों की भीड़—सब कुछ एक सपने जैसा लग ...Read More

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बाबा भाग 2

बाबा भाग 2सुबह के पाँच बज चुके थे। शहर धीरे-धीरे जाग रहा था। आसमान में हल्की लालिमा थी, जैसे ने पर्दे के पीछे से झांककर दुनिया को पुकारा हो।गली के कोने पर चायवाले की केतली से उठती भाप, सड़क पर सफाई कर्मचारी की झाड़ू की खट-खट, और दूधवाले की घंटी — जीवन शुरू हो चुका था।लेकिन राहुल के बेडरूम में अब भी अंधेरा पसरा था। नींद, थकान और जिम्मेदारियों के बोझ से उसका शरीर मानो बिस्तर से चिपका हुआ था।क्लॉक 6:30 दिखा रही थी, तभी ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन — अलार्म जोर से बजा।राहुल ने करवट बदली और फोन बंद किया। उसकी ...Read More