अध्याय 3: नियति का उपहास और काली परछाइयांशून्य-प्रस्थ के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर मोहिनी के वे पाषाण-हृदय सिपाही कई ऋतुओं ...
अध्याय 2: नियति का नया खेलशून्य-प्रस्थ की वादियों में आज एक उत्सव की गूँज थी। कंचन धरा की उस ...
अध्याय 1: सुनहरी राख का सवेराशून्य-प्रस्थ के क्षितिज पर जब सूर्य अपनी पहली किरणें बिखेरता है, तो वह केवल ...