कैफे की उस पहली मुलाकात के बाद कई दिन बीत गए थे, लेकिन आरव का मन अब किसी काम में नहीं लग रहा था। वह जब भी आँखें बंद करता, उसे रिया का भीगा हुआ चेहरा और उसकी चंचल मुस्कान ही याद आती। आरव रोज़ शाम को उसी समय कैफे पहुँच जाता और उसी कोने वाली मेज़ पर बैठकर दरवाज़े की तरफ़ टकटकी लगाए देखता रहता। उसका दिल हर पल इसी उम्मीद में धड़कता कि शायद आज रिया फिर से उस दरवाज़े से अंदर आए।तीन दिन बाद, उसकी यह उम्मीद हक़ीक़त में बदल गई। शाम के वक्त कैफे का दरवाज़ा