नामुमकिन इश्क - एपिसोड 4

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एपिसोड 4: एक अजीब-सी बेचैनीकॉलेज की छुट्टी हुए लगभग एक घंटा बीत चुका था।शाम की हल्की सुनहरी धूप पूरे लखनऊ शहर को अपनी नरम रोशनी से ढक रही थी। सड़कों पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी। कहीं चाट की दुकानें सजी थीं, कहीं कुल्हड़ वाली चाय की महक हवा में घुल रही थी। बाज़ार अपनी पूरी रौनक पर था।उधर आयत अपनी छोटी बहन हया का हाथ पकड़े अमीनाबाद बाज़ार की गलियों में धीरे-धीरे चल रही थी।"आपा... जल्दी चलिए ना, मुझे नई चूड़ियाँ भी लेनी हैं और अम्मी ने कपड़ा भी मंगवाया है।" हया ने मासूमियत से कहा।आयत मुस्कुराई।"अच्छा बाबा...