अमृत वाणी - संत वाणी - 10

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“हर जीव के भीतर साक्षात नारायण का वास है, इसलिए किसी भी प्राणी को छोटा या अछूत समझना ईश्वर का अपमान है।”शंकरदेव जी ने 15वीं-16वीं शताब्दी में असम में एक महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्रांति की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘एकशरण नाम धर्म’ का प्रचार किया, जिसका मूल आधार ही यही था कि परमेश्वर एक हैं और उनकी बनाई इस दुनिया में सभी बराबर हैं।गहरे अर्थ की व्याख्यामहाप्रभु शंकरदेव जी कहते हैं कि परमात्मा केवल मंदिरों की मूर्तियों या आसमान में ही नहीं बैठे हैं। वे इस संसार के हर एक जीव—चाहे वह एक अमीर व्यक्ति हो, एक गरीब मजदूर