हॉल का नज़ारा एकदम अलग था। धूप खिड़की से छनकर आ रही थी और फर्श पर चारों तरफ रंगों के निशान और बिखरे हुए स्केच थे। रणविजय अभी-अभी उस मासूम बच्ची के साथ एक अजनबी सा रिश्ता महसूस करने लगा था। तभी उसकी माँ हॉल में आई। बच्ची को रणविजय की गोद में या यूँ कहें कि रणविजय को एक बच्ची के साथ खेलते देख, माँ की आँखें भर आईं।माँ धीरे से उनके पास आईं और रणविजय के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आवाज़ में एक ममता भरी टीस थी, "बेटा... देख इसे। कितनी रौनक है न घर में? तू