कशमकश - 1

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अध्याय 1: कलाई पर ठहरती कशमकश1.1 धुंध और धड़कनेंसुबह के ठीक पाँच बजे थे। उत्तर भारत की सड़कों पर तैरती सर्द सुबह की वो ठंडी, नम हवा ट्रेन की लोहे की खिड़की से छनकर सीधे अजय के चेहरे पर थपेड़े मार रही थी। ऐसा लगता था मानो वो हवा महज़ एक झोंका नहीं, बल्कि कोई बीता हुआ कल था—जो चेहरे पर जमी थकान को धोना चाहता था, और एक आने वाला कल भी—जो भीतर की बेचैनी को और हवा दे रहा था।अजय ने खिड़की के शीशे से अपना माथा टिका दिया। बाहर आसमान का रंग अजीब था; रात की काली