Hum Tum एक दूजे के यूं हुए

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दार्जिलिंग की वह सुबह किसी डरावने सपने से कम नहीं थी।ठंड इतनी बेरहम थी कि साँस लेते ही फेफड़ों में बर्फ़ चुभने लगती। चारों ओर फैली धुंध किसी शिकारी की तरह पूरी वादी को निगल चुकी थी इतनी घनी कि दो कदम आगे भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। पेड़ों से टकराती ठंडी हवाएँ किसी अदृश्य चीख़ की तरह सिसक रही थीं, मानो पहाड़ खुद किसी अनहोनी की गवाही देने वाले हों।सुनसान सड़कों पर मौत-सी ख़ामोशी पसरी थी।सुबह के ठीक 4 बज रहे थे।तभी उस सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ कार की गड़गड़ाहट गूंजी। हेडलाइट्स की पीली रोशनी