ब्रह्मांड की राख

  • 2.3k
  • 702

रात के ठीक 11:43 बज रहे थे। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी के पेंडुलम की आवाज़ उस सन्नाटे में हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। हवा में कोई भी हलचल नहीं थी, मानो पूरी कुदरत ने अपनी आख़िरी सांस फेफड़ों में रोक ली हो। आसमान का वो चिर-परिचित नीलापन और तारों की चादर गायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक खौफनाक, पिघले हुए तांबे जैसा लाल रंग फैल चुका था, जो इंसानी नज़रों को अंधा कर देने की हद तक चमक रहा था। हवा में किसी पुराने ट्रांसफार्मर के जलने, ओज़ोन गैस और लोहे के पिघलने की एक भयानक,अगर आपको और भी दिलचस्प कहानियाँ पढ़नी