मेहरा मेंशन की रात की उस खामोश बातचीत के बाद, अगली सुबह का सूरज कुछ नई उलझनों के साथ आया. कबीर रात भर सो नहीं पाया था. उसे बार- बार सिया की वो बातें याद आ रही थीं—" बदलना आसान नहीं होता कबीर मेहरा। उसने आज तक खुद को एक चट्टान की तरह समझा था, जिसे कोई हिला नहीं सकता, पर सिया की सादगी उस चट्टान में दरारें पैदा कर रही थी.कबीर सुबह जल्दी तैयार होकर नीचे आया. हॉल में सन्नाटा था, पर रसोई से बर्तनों के टकराने की धीमी आवाज आ रही थी. वो अनजाने में ही रसोई की