सुबह की हल्की रोशनी धीरे-धीरे रेगिस्तान की ठंडी रेत पर फैल रही थी… रात की ठंड अब भी हवा में बची हुई थी, लेकिन सूरज की पहली किरणें उसे अपने अंदर समेटने लगी थीं। उसी किनारे के पास, जहाँ रात को लहरों ने एक अनजाना फैसला अपने साथ बहा लिया था, अब सब कुछ फिर से सामान्य लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो… जैसे उस रात की सच्चाई बस हवा में घुलकर खो गई हो।नदी के पास बसे छोटे से बसेरे में एक साधारण सा घर था मिट्टी की दीवारें, ऊपर खपरैल की छत… और बाहर बंधी