सस्सी–पुन्नू - 1

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रात का समय था…रेगिस्तान अपनी गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन उस खामोशी के भीतर भी एक अजीब सी बेचैनी तैर रही थी। हवा आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ चल रही थीऐसी कि रेत के कण उड़-उड़कर आसमान से बातें करने लगें। दूर-दूर तक फैली वीरानी में बस हवा की सनसनाहट थी, और बीच-बीच में किसी सूखे पेड़ की टहनी के टूटने की आवाज़ जैसे कोई अनकहा राज़ धीरे-धीरे टूट रहा हो। उस रात चाँद भी पूरा नहीं था आधा था… जैसे आसमान ने भी कुछ छुपा रखा हो।उसी वीरान किनारे पर, जहाँ रेत खत्म होकर पानी की लहरों