इश्क और अश्क - 82

  • 117
  • 57

दूल्हे राजा... बहुत जच रहे हो।”अविराज ने पलटकर देखा।कनिष्क।दरवाज़े पर टिका हुआ… बाँहें सीने पर…चेहरे पर वही मुस्कान — जिसमें हमेशा कुछ छुपा होता था।अविराज (सपाट, ठंडे स्वर में):“क्या चाहते हो कनिष्क?”कनिष्क अंदर आया…दरवाज़ा बंद किया…धीरे से… बहुत धीरे से…जैसे हर आवाज़ को भी सुनने की इजाज़त न हो।कनिष्क (हल्की मुस्कान के साथ):“बस देखने आया था…मेरा दोस्त आज दूल्हा बन रहा है…और उसके चेहरे पर खुशी नहीं है।”अविराज:“खुशी है।”कनिष्क (धीरे, काटते हुए):“झूठ…”वह उसके बिल्कुल करीब आ गया।इतना करीब कि उसकी साँसें तक महसूस हो रही थीं।कनिष्क:“मैं तुम्हें जानता हूँ, अविराज…तुमसे बेहतर… शायद तुम खुद को नहीं जानते।”अविराज चुप रहा।उसकी उंगलियाँ