वर्धान ने द्वार पर दस्तक दी।"आइए।"शोभित खिड़की के पास खड़े थे। सुबह की पहली रोशनी उनके सफ़ेद पंखों पर पड़ रही थी। उम्र थी चेहरे पर — पर आँखें अभी भी तेज़ थीं। वही आँखें जो वर्धान को बचपन से पढ़ लेती थीं।उन्होंने पलटकर देखा।बेटे को देखा।आँखों के नीचे काले घेरे। चेहरे पर थकान। पर जबड़ा कसा हुआ — जैसे कमज़ोरी दिखाने से डर लग रहा हो।"रात भर जागे?" शोभित ने सीधे पूछा।वर्धान ने एक पल रुककर कहा —"जी।"शोभित कुछ नहीं बोले। बस इशारे से बैठने को कहा।वर्धान बैठ गया। पर बात शुरू नहीं हुई तुरंत।कुछ देर चुप्पी रही —