16.एक ही गर्भ, एक ही लहूतुम ऊँचे सिंहासन पर बैठे, खुद को 'विधाता' मानते हो?क्या चींटी और क्या हाथी, क्या तुम सबको अपना जानते हो?सब एक ही माँ की कोख से जन्मे, एक ही मिट्टी के पुतले हैं,बस तुम्हारी आँखों पर अहंकार के, हज़ारों परदे धुलने हैं।मछली का तड़पना 'स्वाद' तुम्हारा, और गाय का रुदन 'व्यापार' है,भूल गए? उस निरीह के भीतर भी, उसी चेतना का विस्तार है।तुम जिसे 'पशु' कह कर काटते हो, वह माँ का लाड़ला बच्चा है,सिर्फ इंसान ही श्रेष्ठ नहीं, ये दावा तुम्हारा कच्चा है।प्रकृति के आँगन में सब बराबर, कोई छोटा-बड़ा नहीं होता,जो अपनी ही