New गुनाह अध्याय 1 देवी मंदिर की सीढ़ियाँ उतरती निर्मला डगमगा रही थी। आँखों के आगे जैसे पूरा आकाश घूम रहा था। हवा ठंडी थी, लेकिन माथे पर पसीना छलक आया। उसने दीवार थामी, फिर भी संतुलन नहीं बन पाया। मन में सवाल उठा—यह कमजोरी है या कोई और कारण? सात दिन से व्रत में शरीर जवाब देने लगा था। टाइफाइड से अभी-अभी उठी देह काँप रही थी। लेकिन घर की मर्यादा उसके शरीर से बड़ी थी। पीछे मंदिर की घंटियाँ लगातार बज रही थीं। देवी के जयकारे उसकी चेतना को चीर रहे थे। हर ध्वनि उसे भीतर तक हिला