----------------चारू ने सर उठाकर देखा तो अमर होंठ भींच उसे ही देख रहा था। उसकी उंगलिया पेंट पर कसी हुई थी । आंखे हैरानी और चिढ के मिले जुले भाव से सिकुड गई थी।चारू की सांसे तेज हो गई। वो अमर को ऐसे देख रही थी मानो यमराज सामने खडा हो । उसका दिल जोरो से धड़कने लगा। आँखे डर से और शर्म के मीले जुले भाव से फैल गई। दिसंबर की सर्दी मे भी , चारू के पसीने छुट गए। उसकी पुतलिया घूमी....और अगले ही पल—धम्म!!!!!अमर की आंखे फैल गई। उस जगह पर मौजूद हर एक इंसान आश्चर्य से