"बीमारी बढ़ती गई, इलाज कहीं ना मिला"---एपिसोड 4: अस्पताल की वो रातेंआइना के बिस्तर के पास मैं बैठा था। उसका हाथ मेरे हाथ में था। बाहर बारिश हो रही थी। अस्पताल की मशीनें बीप-बीप कर रही थीं।"तुम यहाँ कितनी देर से हो?" उसने कमजोर आवाज़ में पूछा।"दो घंटे।""घर जाओ, आदित्य।""नहीं जाऊंगा।"वो मुस्कुराई। वही मुस्कान। लेकिन अब उसमें दर्द था।"तुम बहुत जिद्दी हो।""तुम्हारे सामने से यही सीखा है।"वो चुप हो गई। फिर बोली, "कोई कहानी सुनाओ मुझे।""कैसी कहानी?""हमारी। जो अभी लिखी जा रही है।"मैंने उसे बताना शुरू किया। उस पहली बारिश से, उस पहली चाय से, उस पहली मुलाकात से।वो सुनती