प्रणाली की आँखें खुली थीं।पर मन कहीं और था।कमरे में धीरे धीरे सब आ गए थे — माँ, पिताजी, भाई परस — सबके चेहरों पर राहत थी, खुशी थी। जैसे कोई बड़ा तूफान टल गया हो।पर प्रणाली के अंदर —एक अलग ही तूफान था।वर्धान।बस यही एक नाम था जो उसके दिमाग में घूम रहा था। वो ठीक है? कहाँ है? क्या हुआ उसे?तभी अगरेन का स्वर सुनाई दिया —"अब तो अविराज भी युद्ध से आ गया है... तो अब तुम दोनों के विवाह की तैयारी शुरू कर सकते हैं।"प्रणाली ने सुना — पर जैसे सुना नहीं।परस ने धीरे से कहा