14235: जिज्ञासा और जाति

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“सफ़र अक्सर हमें मंजिलों से नहीं, सवालों से मिलाते हैं। ट्रेन की ऊपरी बर्थ पर बैठा वह ग्यारह साल का बच्चा, जो अभी ठीक से दुनिया को समझना शुरू भी नहीं कर पाया था, उसके पास ‘जाति’ और ‘भौकाल’ जैसे शब्दों का होना समाज की किस सच्चाई की ओर इशारा करता है? पेश है मेरे ताज़ा सफ़र के अनुभवों से उपजी एक छोटी सी कहानी -14235: जिज्ञासा और जाति।”      “कृपया ध्यान दीजिए – अयोध्या, सुल्तानपुर के रास्ते प्रयागराज संगम की ओर जाने वाली गाड़ी संख्या ‘14235’ प्लेटफॉर्म नंबर ‘तीन’ पर आ चुकी है।”मैं इसी गाड़ी का इंतज़ार कर