PLATFORM - 3

  • 367
  • 129

---Chapter 3: फँसा हुआरात के 11:51।---प्लेटफ़ॉर्म पर वही हल्की गूंज।Announcements दूर से आ रही थीं…पर साफ नहीं।जैसे कोई आवाज़ पानी के अंदर से सुनाई दे।---अंगद खड़ा था।आज… वो भाग नहीं रहा था।---उसके जूते प्लेटफ़ॉर्म की उसी लाइन पर थे—जहाँ कल थे।---उसने नीचे देखा।फिर घड़ी।---11:51 → 11:52---“आज नहीं…”उसने होंठ भींचे।“आज कुछ नहीं होगा।”---दूर से हेडलाइट उभरी।धीरे-धीरे बड़ी होती हुई।---ट्रेन आई।रुकी।---इस बार— अंगद सबसे पहले अंदर गया---डिब्बा वही।सीट वही।हवा भी जैसे वही।---पर आज वो बैठा नहीं।---वो दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।---हाथ ऊपर की rod पर।पकड़ इतनी tight कि उंगलियाँ सफेद पड़ गईं।---“देखते हैं…”उसने बुदबुदाया।---ट्रेन चल पड़ी।---पहला झटका।---उसका शरीर हल्का सा हिला…पर नज़र