सुबह होने में दो घंटे बाकी थे। मीरा ने एक भी पल नहीं सोई।अर्जुन कमरे में था — फर्श पर, दीवार के साथ, आँखें बंद। सोया नहीं था वो भी। दोनों जानते थे। किसी ने नहीं बोला।मीरा के दिमाग में वो औरत का चेहरा था। लैब कोट। थकी हुई आँखें। और वो एक पंक्ति जो वो कह नहीं पाई थी — "और फिर—"और फिर क्या? · · ·"झंडे का मतलब क्या होता है उनके तंत्र में?" मीरा ने आखिरकार पूछा। आवाज़ धीमी थी