प्रेम पल्लवी - 2

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२    सुबह की ताज़ा धूप सुकुमार कलियों के साथ खेल रही थी। हवा का प्रवाह धीमा था और उसमें फूलों की सुगंध घुली थी। उस ठंडी नसीम में सुबह की ताज़गी भरी थी; वह जिस तरफ़ से निकलती, उस तरफ़ के पेड़ों की कलियाँ खिल उठतीं। उस हवा के झोंके का स्पर्श इतना नन्हा, कोमल और शरारती था कि कान में ऐसी गुदगुदी करता कि मन खिल उठता!    मैं उठा ही था कि पिताजी ने दो हज़ार रुपये मेरी जेब में डालते हुए कहा, "ये रुपये दीनदयाल को दे आओ।" मैं कारण पूछता, उससे पहले ही उन्होंने कहा, "घर में सब्ज़ी का