(️ नोट :इस कहानी में “काली माँ” नाम सिर्फ एक काल्पनिक पात्र के लिए इस्तेमाल किया गया है, जिसका किसी देवी, धर्म या आस्था से कोई संबंध नहीं है।मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना बिल्कुल भी नहीं है।)भाग 4: पूर्णिमा का नरसंहार रात…धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी।आसमान में चाँद पूरा चमक रहा था—पूर्णिमा।लेकिन उसकी रोशनी अब सुकून नहीं दे रही थी…बल्कि हर चीज़ को और डरावना बना रही थी।हवेली के चारों तरफ फैली सफेद चाँदनी में…परछाइयाँ लंबी हो चुकी थीं।हवा…भारी हो चुकी थी।जैसे पूरे माहौल ने सांस लेना बंद कर दिया हो।हर चीज़…एक अनजाने डर से जकड़ी